अखाड़ा परिषद अध्यक्ष श्रीमहंत डा.रविंद्रपुरी ने किया गुजरात से आए महामंडलेश्वर स्वामी कुर्षी पुरी और भक्तों का स्वागत

हरिद्वार, नासिक और उज्जैन कुंभ में वाल्मीकि अखाड़ा के संत समाज के साथ स्नान की घोषणा की

सनातन धर्म में जातिगत भेदभाव का कोई स्थान नहीं-श्रीमहंत रविंद्रपुरी

गंगा किसी से जाति नहीं पूछती-स्वामी कुर्षी पुरी

हरिद्वार, 8 अगस्त। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत डा.रविंद्रपुरी महाराज एवं निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रामरतन गिरी महाराज ने गुजरात से भक्तों के साथ आए महामंडलेश्वर स्वामी कुर्षी पुरी महाराज का फूलमाला पहनाकर भव्य स्वागत किया। चरण पादुका मंदिर में परिसर में आयोजित कांवड़ सेवा शिविर में महामंडलेश्वर स्वामी कुर्षी पुरी और उनके साथ आए भक्तों का स्वागत करते हुए श्रीमहंत डा.रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म में जातिगत भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। जब गंगा किसी की जाति नही पूछती तो हम कौन होते हैं भेदभाव करने वाले। संत परंपरा और अखाड़ों में सभी समान हैं। उन्होंने कहा कि श्री रविदास अखाड़ा हो, निरंजनी अखाड़ा हो अथवा जूना अखाड़ा या कबीर पंथ हो। संत समाज के लिए सभी सनातनी समान हैं। हमारा उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना और सनातन को मजबूत करना है। इस अवसर पर श्रीमहंत डा.रविंद्रपुरी महाराज ने महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि अगले वर्ष होने वाले हरिद्वार कुंभ और नासिक महाकुंभ के साथ उज्जैन कुंभ में वाल्मीकि अखाड़ा संत समाज के साथ कुंभ स्नान करेगा। श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज की घोषणा का मौजूद श्रद्धालु भक्तों ने वाल्मीकि भगवान की जय, गंगा मैया की जय और हर-हर महादेव के जयघोष से स्वागत किया। निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रामरतन गिरि महाराज ने कहा कि संत समाज में जाति का कोई स्थान नहीं है। अखाड़ो में भी किसी प्रकार का जातिगत भेदभाव नहीं किया जाता है। त्याग और तपस्या ही संत की पहचान है। उन्होंने कहा कि सनातन समाज एकजुट होकर अपनी शक्ति को पहचाने और सनातन धर्म को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ खड़ा हो। गुजरात से आए महामंडलेश्वर स्वामी कुर्षी पुरी महाराज ने कहा कि मां गंगा की धारा सबके लिए समान है। गंगा किसी से उसकी जाति नहीं पूछतीं, सभी को अपने आंचल में स्थान देती हैं और सभी को पवित्रता का आशीर्वाद देती हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मां गंगा बिना किसी भेदभाव के सभी को स्वीकार करती हैं, उसी प्रकार संतों की वाणी और सनातन की परंपरा भी सर्वसमावेशी और मानवता को जोड़ने वाली है। इस दौरान महामंडलेश्वर स्वामी ललितानंद गिरी, महंत राजगिरी, पंडित अधीर कौशिक सहित कई संत महंत मौजूद रहे।

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