विलुप्त परंपराओं और प्रथाओं को करेंगे पुनर्जीवित: श्रीमहंत डॉ रविंद्रपुरी महाराज 

मनसा देवी मंदिर में फिर से प्राचीन वाघ यंत्रों से शुरू होगी पूजा अर्चना

हरिद्वार, चैत्र नवरात्र के अवसर पर मनसा देवी मंदिर से एक अभिनव पहल की शुरुआत होने जा रही है, जिसका उद्देश्य पौराणिक परंपराओं को पुनर्जीवित करने के साथ ही मंदिरों में सभी जातियों की सहभागिता को बढ़ावा देना है। गुरुवार को मनसा देवी मंदिर पहुंचे अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ रविंद्रपुरी महाराज ने मीडिया से वार्ता कर बताया कि प्राचीन समय में मंदिरों में पूजा-अर्चना के दौरान नगाड़ा, ढोला ढोली, दमाऊ, शहनाई और तुरही जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग होता था। इन वाद्य यंत्रों की ध्वनि से ही मंदिरों में आरती और पूजा का वातावरण बनता था, लेकिन आधुनिक दौर में ये परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त हो गई हैं। उन्होंने कहा कि अब इन पौराणिक वाद्य यंत्रों को फिर से मंदिरों में स्थापित किया जाएगा, जिससे न केवल सनातन परंपराओं का संरक्षण होगा, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। उन्होंने बताया कि बड़े ढोले की थाप को देव जागरण का प्रतीक माना जाता है और इससे जनकल्याण की भावना भी जुड़ी हुई है। श्रीमहंत डॉ रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि मंदिर किसी एक वर्ग या जाति के नहीं होते, बल्कि सभी सनातनियों के लिए समान रूप से खुले होते हैं। उन्होंने बताया कि पहले मंदिरों में विभिन्न जातियों के लोग पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने का कार्य करते थे, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था समाप्त हो गई। अब इस परंपरा को फिर से शुरू किया जाएगा और संबंधित लोगों को पुनः जोड़ा जाएगा। उन्होंने बताया कि इस पहल की शुरुआत मनसा देवी मंदिर से की जा रही है और इसके लिए पारंपरिक वाद्य यंत्रों का ऑर्डर भी दे दिया गया है। आने वाले समय में अन्य मंदिरों में भी इस व्यवस्था को लागू करने की योजना है, जिससे सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जा सके और समाज के सभी वर्गों को समान अवसर मिल सके।

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